Poetry

दर्द-ए-दिल की दस्ता

क्या बताये तुझे, इस दर्द-ए-दिल की दास्तां,
क्या बताये तुझे, इस दर्द-ए-दिल की दास्तां|
तू है वहाँ, हम न पहुँच सके जहाँ||

ताकती रहे ये नीगाहें, उस द्वार को उस राह को,
ताकती रहे ये नीगाहें, उस द्वार को उस राह को|
और तू ऐसे आये, और यूँ चला जाये||

क्या बताये तुझे, उस इंतज़ार-ए-आलम का नशा,
क्या बताये तुझे, उस इंतज़ार-ए-आलम का नशा|
तेरी एक झलक ही, क्या असर कर जाये||

हँसती रहे ये निगाहें, मेरे इस हाल पे इस बात पे,
हँसती रहे ये निगाहें, मेरे इस हाल पे इस बात पे|
और तू मेरे ये  मदहोशी, कभी जान ही न पाये||

क्या बताये तुझे, इस दर्द-ए-दिल की दास्तां,
क्या बताये तुझे, इस दर्द-ए-दिल की दास्तां|
तू है वहाँ, हम न पहुँच सके जहाँ||

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आज भी

चिलमन से वो
अाज भी छाक जाती है
उसके नाम से आँखे
आज भी नम हो जाती है
एक तिरझी मुस्कान से
किस्मत मुझे छेड़ जाती है
उसके नाम पे धड़कन
अाज भी थम जाती है
उसके नाम पे धड़कन
आज भी थम जाती है
उसकी बेवफाईयाँ ही अब
वफा कर जाती है
उस के नाम पर
आज भी साँसे रूक जाती है

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जुदा सा ये जहाँ

जुदा सा ये जहाँ
जुदा जुदा सी हर दिशा।
गुम है ये जुस्सत्जु
गुम गुम सा तेरा नशा।
सुना सा ये दिल
सुना सुना सारा मकां।
प्यासी है जमी
प्यासा प्यासा आशमा॥
खफा हुए जो तुम
खफा खफा सा ये शमा॥

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जिंदगी की इस घुप में

जिंदगी की इस घुप में
मैं  प्यासी रह गयी
दुनिया की दौड में
जैसे मैं पीछे रह गयी
सब कितने आगे और मैं
कितने पिछे रह गई
कोई मन में कोई धन में
मुझसे ऊपर निकल गये
छोटे भी अब उच्चें लगने लगे
बेबसी तो किस्से लगने लगे
कुछ प्यार तो बक्सा रब ने
पर कुछ तो उस में भी
पार निकल गये

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हमने कुछ खोया न होता

खुश वो भी थे
खुश हम भी थे
जब दिन वो हसीन थे
दिल हमने था लगाया
उसने दामन अपना बचाया
खुश वो आज भी हो शायद
खुश हम भी है शायद
पर ये शायद, शायद न होता
जो तुने यु मुहँ फेरा न होता
क्या मिला तुझे हमे लुट के
शायद तुझसे जुदा होकर
हमने कुछ खोया न होता।

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मोहब्बत कम पड़ गई

चाहा उसे इतनी शिद्ददत से
कि चाहत कम पड़ गई
और वो कहते की हमारी
उल्फत-ए-मोहब्बत कम पड़ गई।

सूखी रही दिल की राहें
प्यासी रही दिले-ए-तमन्ना
और वो कहते है कि मैं
समुद्र-ए-मोहब्बत लुट गई।

खाक हो गई ये खाकसार
इज्हार-ए-महोब्बत में
और वो कहते है की हमारी
नमाज़-ए-मोहब्बत कम पड़ गई।

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फुर्सत के दो पल

फुर्स्त के दो पल कुछ यूँ मिले
के एक पल मे ही गुजर दिये
सपने जो देखे मैनें
तेरी पलको मे सजा दिये
आज कुछ नगमे लिखे मैनें
जो तुझे आँखो से ही सुना दिये
जुस्तजु जो कैद थी इस सीने में
तुने अपने सीने में समा लिए
छलक उठे आँखो से कैद दरीया
और तूने उनहें भी मोती बना दिये
हमने फलक  पर तारे देखने की तमन्ना की
तूने अपने चाँद को देखने की गुजारिश की
बस फुर्सत के दो पल कुछ यूँ ही गुजार दिये।

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जहां

गुम-गुम सा
सुन-सुन सा
सारा जहां लगता है
अब बेगाना-सा
ये घर संसार लगता है
बाजारो की भीड़ मे घुटता
ये इंसान लगता है
अब तो अपना
भी पराया लगता है
खो जाने वाली भीड़ मे
तन्हां-सा मकान लगता है
बन्दिशो मे बन्धा है  जहां
उस कुँए से
छोटा-सा आसमा लगता है
गुम है यहाँ सारी दिशाएं
गोल-सा सारा जहां लगता है
प्यार के इन्तजार मे
प्यासा सारा जहां लगता है
घुँआ-ही-धुँआ है यहाँ
मौत का ताडंव लगता है
मौत भी क्या मौत दे
जिन्दा लाशो का ढेर लगता है
चाबी  भरकर चलता-सा
ये पुरा जहां लगता है।

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गुन्हा

ये उनका गुन्हा था
या हम ही कुछ
ऐसा कर बैठे।
अनजानी राहों पर जो
खुद को ले जाने पर
मजबूर कर बैठे।
हर पल की ताबीर
को साथ लेकर
एक तस्वीर तो
बना ली हमने।
पर उस को जहां के सामने
नुमाइस कर गुन्हा कर बैठे।
और इस दौर-ऐ- तिजारत में
खुद को ही गवा बैठे।

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लम्हे

हर लम्हा नया रस लाता
जीवन का नया ही ताल सुनाता
जीवन में कितने रंग बिखरे
अहसास करा जाता
पर कुछ लम्हे निरस से रह जाते
कुछ अहसास नही होता
सब पास हो कर भी
कुछ पास नही होता
दोस्तो के बीच भी
तन्हाई घेर जाती है तब
दोस्त भी बेगाने और
दुश्मन भी अनजाने
नजर आते है तब।

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वो रिश्तें

जिन रिश्तों में
दिल का ख्वाब था
जिन्हें पाला-पोसा
सिचां हमने
वो आज बड़े हो
खुद चलने लगे है
सब कुछ
सिखाया था हमने
पीछे मुड़ने के सिवा
वो हमे आज
पिछे छोड़ चले है

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रिश्ते

कुछ अनजाने से रिश्ते
कुछ पहचाने
कुछ अजनबी से लगे
समय के मेल से बने
पता नही कब तक
मन मे बसे रहे
पेड़ के सुखे पत्ते से
पत्तो से हल्के
पर पत्तर से भारी लगे
पेड़ जुदा करना चाहे
पर कर न पाऐ
किसी छोकें के इन्तजार में
आसमा को तकता रहे।

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तमन्ना

हर तमन्ना उठती है
इश्क की ताबीर से
बह जाती है
वक्त की रुखसाई से
विषक्त हो जाती है
जमाने की रुसवाई से
तीर्व है जो
आवेग से भरी
छा जाए धुआ बन
हस्ती पर मेरी
गरजते है बादल तब
लाज-हया के बन्धन
टकराते है जब

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मोती थी मैं

7bcc6be092d4e42b1e8d4da5d5f84c80मोती थी जब तक सिप में थी
डोलती, घुमती बस मदहोश थी
उस समुद्र ने फिर छोड़ दिया
अन्जाने किनारे को सोंप दिया
बस अब तो नाम ही है साथ
बाकी तो खुला है आकाश
पत्तरो में अपना वजुद खोजते है
इस दुनिया कि रंगीनी से डरते है
या तो कोई माला में पिरोऐगा
या हंस कोई चुग जाएगा।

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जुस्तजु

हँस हम भी लेते है जालिंम ,
जमाने को देखकर।
पर दर्दे-ए-दिल का आलम,
बया तन्हाईया ही करेगी।
जी रहे किस तरह
ओढ  लबादा-ए-दरोग़।
जुस्तजु-ए-दिल तो
बया खामोशियाँ ही करेगी॥

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नींद आती नहीं

वो तब भी कुछ ओर थे,
ओर अब भी कुछ ओर है।
वो हमे जाने नहीं,
ओर हम उन्हे पहचाने नहीं।

बढ़ाते रहें कुछ इस तरह,
हम जिन्दगी का सफर।
जिसमे उसने कुछ खोया नहीं,
ओर हमने कुछ पाया नहीं।

भरी उड़ान हमने भी,
उस पंछी की तरह।
उसने कोई राह सोची नहीं,
ओर हम कहीं पहोचे नहीं।

दर्द कि आवाज पहुँच जाए,
पत्तर का सीना भी चिर कर।
पर उसने कुछ सुना नहीं,
ओर हमने कुछ कहा नहीं।

देखेगे ख्वाब हम भी,
नुर-ऐ-परछाई का।
पर उसकी नींद जाती नहीं,
ओर हमे नींद आती नहीं।

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ऐसे में तेरी याद बहुत आती है

वो छम-छम सी झन्कार
जैसे पायल कि आवाज
वो बारीस कि फुआर
संगीत कोई सुनती है
बिजली बिगुल कोई बजाती है
वो सोन्धी सोन्धी सी महक
रुह मे कही बस जाती है
ऐसे में तेरी याद बहुत आती है
अब नया सा है हर ओर
धुला सा है भोर
गुम हो गए है सोर
सन्टा है हर ओर
कही से होरन कि आवाज आती है
चिडिया भी चीं-चीं चिलाती है
पत्ते से एक बुन्द
हथेली पर गिर जाती है
ऐसे में तेरी याद बहुत आती है।